इतिहास के पदचिह्न

28 अक्टूबर 1913 जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा की स्थापना हुई।
2 नवम्बर 1913 तेरापंथी सभा की कार्यकारिणी की पहली मीटिंग हुई।
24 मई 1914 पहला वार्षिक अधिवेशन आयोजित।
5 जुलाई 1914 सर्वप्रथम महासभा का विधान बना और उसे कार्यसमिति में वृद्धिचंदजी गोठी ने रखा।
16 अगस्त 1914 प्रथम बार सात ट्रस्टियों का निर्वाचन हुआ।
23 अगस्त 1914 पहली बार किराये के मकान पर महासभा कार्यालय रखने का निर्णय हुआ – 71, क्लाइव स्ट्रीट (तीसरा तल्ला)
6 फरवरी 1916 महासभा का कार्यालय 71, क्लाइव स्ट्रीट से 30/2, क्लाइव स्ट्रीट के मकान में चला गया।
23 अगस्त 1923 सभा का कार्यालय 156, एम जी रोड पर स्थानांतरित।
28 जनवरी 1940 लंबी–चौड़ी कार्यकारिणी की जगह सक्रिय सदस्यों वाली इक्कीस – सदस्यीय कार्यसमिति (वर्किंग कमिटी) का प्रथम बार गठन हुआ। जोधपुर राज्य में तेरापंथी साधु-साध्वियों को कोर्ट में न बुलाया जाये – इस आशय का आदेश सूरजमल बेंगानी ने अपने प्रभाव से निकलवाया। सभा ने उनको धन्यवाद का तार भेजा।
24 मई 1942 सभा का कार्यालय किराये के नए मकान 201, हरीसन रोड (दूसरा तल्ला), सदासुख कटरा में ले जाया गया।
19 अक्टूबर 1946 संविधान निर्मात्री सभा के लिए समाज के सदस्यों की कमेटी गठित।
30 जनवरी 1947 चौतीसवें वार्षिक अधिवेशन में तेरापंथी सभा ‘तेरापंथी महासभा’ के रूप में अभिहित हुई।
31 जनवरी 1947 महासभा द्वारा 'समाजभूषण' अलंकरण दिए जाने की परम्परा का प्रारम्भ हुआ। इस प्रक्रिया के अंतर्गत महासभा के स्तंभ श्री छोगमलजी चौपड़ा प्रथम ‘समाजभूषण’ बने।
29 अगस्त 1947 महासभा का एक डेपुटेशन महात्मा गांधी से मिला और उन्हें दंगापीड़ित राहत-कोष में 2500 रुपये भेंट किये। साथ ही आचार्य श्री तुलसी द्वारा लिखित ‘अशांत विश्व को शांति का सन्देश’ नामक छोटी पुस्तिका व कुछ अन्य साहित्य भी भेंट किए गए।
17 फरवरी 1948 पैंतीसवें वार्षिक अधिवेशन में प्रतिमाह प्रकाशित होने वाली ‘विवरण पत्रिका’ का नाम बदल कर ‘जैन भारती’ करने का निर्णय हुआ।
1 मार्च 1949 सरदारशहर में महासभा के अंतर्गत पारमार्थिक शिक्षण संस्था की स्थापना की गई।
2 मार्च 1950 महासभा की कार्यकारिणी की मीटिंग प्रथम बार अपने निजी भवन 3, पोर्तुगीज चर्च स्ट्रीट, कोलकाता - 700001 में हुई। स्थापना के सैंतीस वर्ष बाद कार्यकर्ताओं का स्वप्न साकार हुआ।
8 फरवरी 1954 महासभा के अंतर्गत समाज सुधार कार्यक्रम की शुरुआत हुई और उसे विधिसम्मत माना गया।
13 नवम्बर 1955 महासभा द्वारा आगम-प्रकाशन का निर्णय किया गया।
14 फरवरी 1959 महासभा अधिवेशन (सेंथिया) में पहली बार आचार्य तुलसी का उद्बोधन हुआ।
26 जुलाई 1965 पहले सभी साबालिक तेरापंथी महासभा के सदस्य माने जाते थे। अब, 26 जुलाई 1965 में बने नये विधान के अनुसार, महासभा की सदस्यता उन्हीं व्यक्तियों को दी गई जो महासभा के सदस्य बने।
8 जुलाई 1968 महासभा के अंतर्गत जैन विश्व भारती विभाग खुला। श्रीचंदजी रामपुरिया उसके प्रथम संयोजक बने।
9 अगस्त 1986 लाडनूं में महासभा का शाखा कार्यालय खोलने का निर्णय किया गया।
4 फरवरी 1987 महासभा विधान में बड़े परिवर्तन - अध्यक्षीय प्रणाली, सभाओं को एफिलिएटेड बनाने का प्रावधान, सेंट्रल काउंसिल की समाप्ति, कार्यसमिति सदस्य संख्या को 41 से बढाकर 100 किया गया, कार्यसमिति का कार्यकाल दो वर्ष करने का निर्णय, उपाध्यक्ष सात की जगह पांच लेने का निर्णय।
1 दिसम्बर 1988 प्रतिवर्ष तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मलेन करने का निश्चय किया गया।
10 फरवरी 1989 आचार्यवर से संबोधन प्राप्त श्रावक-श्राविकाओं को सम्मानित करने का उपक्रम प्रारंभ।
16 मार्च 1991 महासभा में ‘प्रधानमंत्री’ की जगह ‘महामंत्री’ शब्द का प्रयोग करने का निर्णय लिया गया।
1991 ‘कर्मणा जैन’ प्रोजेक्ट महासभा के जिम्मे सौंपा गया।
12 अप्रैल 1992 ज्ञानशाला का व्यवस्थित प्रारूप बनाने व राष्ट्रीय स्तर पर उसके संचालन की व्यवस्था का उत्तरदायित्व तथा उपासक वर्ग का प्रबंध महासभा के जिम्मे सौंपा गया।
2002 आर्थिक आत्मनिर्भरता हेतु स्थायी कोष का निर्माण किया गया।
15 अगस्त 2003 श्रेष्ठ सभा पुरस्कार एवं सभा प्रोत्साहन पुरस्कार की स्थापना की गई।
4 अप्रैल 2004 पुस्तकालय का नवीनीकरण एवं भिक्षु ग्रंथागार नामकरण किया गया।
20 अगस्त 2004 आईएसओ 9001:2000 प्रमाण पत्र की प्राप्ति।
6 फरवरी 2005 समाजभूषण श्रीचंद रामपुरिया स्मृति व्याख्यानमाला बोधि का प्रारंभ।
31 मई 2005 महासभा लोगो का कॉपीराइट रजिस्ट्रेशन।
18 जून 2005 महासभा के आजीवन सदस्यों को फोटो सहित पहचान पत्र जारी करने का निर्णय।
2005 डिजिटलाइजेशन - हस्तलिखित ग्रंथों एवं महासभा के महत्वपूर्ण रिकॉर्ड्स का। दिल्ली में महासभा का कार्यालय प्रारंभ करने का निर्णय।