उपासक श्रेणी

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चारित्रात्माओं, समणश्रेणी एवं मुमुक्षुश्रेणी की सीमित संख्या के कारण सुदूर क्षेत्रों में फैले श्रावक समाज की समय-समय पर आध्यात्मिक सार-संभाल हेतु आचार्यश्री तुलसी द्वारा 1992 से ‘उपासक श्रेणी’ का नया विकल्प समाज के सामने प्रस्तुत किया गया। विभिन्न क्षेत्रों की प्रार्थना पर पर्युषण पर्वाराधना करवाने की दृष्टि से इस श्रेणी के सैंकड़ों वर्ग प्रतिवर्ष प्रेषित किए जाते हैं, फलस्वरूप तत्रस्थ श्रावक समाज विशेष रूप से लाभान्वित होता है। इस श्रेणी के प्रारम्भ से ही इसकी संपूर्ण व्यवस्थाओं व विकास का दायित्व महासभा बखूबी निभा रही है।

महासभा द्वारा प्रतिवर्ष पूज्यप्रवर के पावन सान्निध्य में अष्टदिवसीय उपासक प्रशिक्षण शिविर, त्रिदिवसीय सेमिनार, स्थान-स्थान पर प्रशिक्षण कार्यशाला आदि का आयोजन भी किया जाता है।प्रशिक्षित उपासक-उपासिकाओं की संख्या वर्तमान में 691 है।