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सहभागिता योजना
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सहभागिता योजना

समाज में संविभाग और संस्कार का निर्माण करना तेरापंथ धर्मसंघ की आधारशिला रही है। व्यक्ति के विकास में समाज का अशेष उपकार और अवदान होता है। अत: हर उपकृत व्यक्ति का धर्म है कि समाज से उसे जो कुछ प्राप्त हुआ है उसके बदले वह कुछ प्रतिदान करे। सहभागिता योजना इस अवधारणा का आंशिक विस्तार है।

सहभागिता योजना का मूल उद्देश्य समाज के अधिकाधिक परिवारों को संघीय गतिविधियों से जोड़ना, संस्थाओं में संघीय प्रवृत्तियों के संचालन हेतु संसाधन उपलब्ध करना, प्राप्त संसाधनों का सुनियोजित रूप से उपयोग करना तथा स्थानीय संस्थाओं की आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करना है।

जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा समाज एवं व्यक्ति के सर्वांगीण विकास हेतु अनेक संघीय गतिविधियों का संचालन किया जाता है। ये संघीय गतिविधियाँ साधना, शिक्षा, संस्कार निर्माण, सेवा, समन्वय, संप्रसार आदि से जुड़ी होती हैं और धर्म शासन तथा समाज की गरिमा को बढ़ाती हैं। इन सभी प्रवृत्तियों के सम्यक संचालन के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। अत: यह अपेक्षित है कि संपूर्ण तेरापंथी समाज संघीय गतिविधियों एवं प्रकल्पों के संचालन में सहभागी बने।

तेरापंथ धर्मसंघ के पूज्य आचार्यों ने सहभागिता के संदर्भ में विसर्जन की भावना का प्रतिपादन किया है। विसर्जन का अर्थ है त्याग। हमारे मन में त्याग की भावना तभी पैदा हो सकती है जब हम अपनी वस्तु या संपत्ति पर से अपने ममत्व को थोड़ा कम करते हैं और संग्रह एवं व्यक्तिगत स्वामित्व को त्यागने का प्रयास करते हैं। परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी का पावन पाथेय है कि व्यक्ति में अनुकंपा की चेतना जागृत हो और वह धन के प्रति अपनी आसक्ति एवं मोह को त्यागने का प्रयास करे।

समाज या राष्ट्र हित में विसर्जन की प्रेरणा जाग्रत कर हम अपने संघ की सांगठनिक शक्ति को सशक्त करने में सहयोगी बनते हैं और समाज को संपोषित, संस्कारित एवं समुन्नत करने में उदारतापूर्वक योगदान करते हैं। महासभा द्वारा संचालित सहभागिता योजना की यही पृष्ठभूमि है जिसके प्रति हर तेरापंथी को पूरी धार्मिकता एवं निष्ठा के साथ जुड़ने की अपेक्षा है।

उद्देश्य

  1. अनाशक्ति की चेतना का विकास
  2. अधिकतम परिवारों की संघीय गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता
  3. संसाधनों का सुनियोजन
  4. स्थानीय संस्थाओं की आत्मनिर्भरता का विकास
  5. संस्थाओं में आर्थिक पारदर्शिता का विस्तार
  6. संघीय प्रवृत्तियों के संचालन हेतु संसाधनों की उपलब्धता
  7. समाज की क्षेत्रवार आर्थिक स्थिति का आकलन एवं आवश्यकताओं की पूर्ति

प्रारूप

  • तेरापंथ का प्रत्येक परिवार प्रति वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) निश्चित रूप से विसर्जन करें
  • सभी तेरापंथी सभाएं अपने अपने कार्यक्षेत्र एवं निकटवर्ती निर्धारित क्षेत्र के परिवार से इस हेतु संपर्क करें
  • जिन क्षेत्रों में सभाएं नहीं पहुँच सकती वहाँ अन्य संघीय संस्थाओं या कार्यकर्ताओं को इस हेतु महासभा द्वारा।

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