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उपासक : अर्हता विकास

उपासकों से यह अपेक्षा रहती है कि वे अपनी अर्हताओं के विकास की ओर सदा जागरूक रहें। इसके लिए आवश्यक है –

  • वे अपने कंठस्थ ज्ञान में वृद्धि करते रहें।
  • तात्विक एवं व्यावहारिक ज्ञान की समझ में परिपक्वता लाएं।
  • वक्तृत्व व गायन शैली का विकास करते रहें।
  • प्रेक्षाध्यान के प्रयोगों को स्वयं करने और कराने का अभ्यास बढ़ाएं।
  • उच्चारण शुद्धि का अभ्यास करें।
  • अपने व्यवहार व आचरण में संयम और सादगीपूर्ण जीवन शैली को प्रधानता दें।
  • जैन जीवन शैली के अनुरूप पहचान बनायें।
  • आवेश – आवेग पर नियंत्रण रखें।
  • उपशम की साधना करें।

कंठस्थ ज्ञान – ऊपर उल्लिखित कंठस्थ ज्ञान को परिपक्व रखते हुए उपासना भाग – 2 में समाविष्ट प्राकृत पदावली, संस्कृत श्लोक, राजस्थानी पदावली एवं बहुप्रचलित गीतिकाएँ एवं व्याख्यान यथासंभव अधिक से अधिक कंठस्थ रखने का प्रयास करें।

समझ – जैनधर्म, तेरापंथ, अणुव्रत-आन्दोलन, प्रेक्षाध्यान, जीवन विज्ञान, पच्चीस बोल-विवेचन, रत्नत्रयी – श्रावक के बारह व्रत, आचार्य परम्परा, निर्धारित तीर्थंकर जीवन-वृत, निर्धारित व्याख्यान, तेरापंथ संघ की विभिन्न गतिविधियां, पर्युषण पर्व के नवाह्निक कार्यक्रम के नौ विषय – खाद्य संयम, स्वाध्याय, सामायिक, वाणी संयम, अणुव्रत, जप, ध्यान, संवत्सरी, क्षमा दिवस (खमतखामणा) इन विषयों का विश्लेषण और कार्यक्रम व्यवस्थापन।

वक्तृत्व व गायन – भाषण देने व गीत आदि गाने का अभ्यास करते रहें। अपने वक्तृत्व को प्रभावशाली व ठोस बनाने के लिए नियमित सलक्ष्य स्वाध्याय करें, प्रवचन सुनें और अपने ज्ञान को बढ़ाते रहें।

प्रेक्षाध्यान – आसन प्राणायाम व ध्यान आदि के प्रयोग करने व कराने में परिपक्वता लाएं।

उच्चारण शुद्धि – शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करें।

पाठ्य पुस्तकें – गाथा, श्रावक प्रतिक्रमण, जीव, अजीव, उपासना भाग – 1, उपासना भाग – 2

सन्दर्भ पुस्तकें – जैन तत्व विद्या (कालू तत्व शतक), जैन धर्म के मूल सूत्र, प्रेक्षाध्यान प्रयोग पद्धति, पर्युषण साधना
(ये पुस्तकें पाठ्यक्रम का भाग नहीं हैं पर अध्ययन के लिए उपयोगी हैं।)


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