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महासभा का इतिहास
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जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा का गठन -आरंभिक काल (1914-1939)

जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा एक रजिस्टर्ड संस्था है। इसकी स्थापना कार्तिक कृष्णा 14, सं 1970, तदनुसार 28 अक्टूबर 1913, मंगलवार को हुई थी। प्रारम्भ में इसका नाम जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा रखा गया था। इसके प्रथम अध्यक्ष कालूरामजी धाड़ेवा (‘चैनरूप संपतराम’ फर्म – सरदारशहर के मुनीम) चुने गए। सेक्रेटरी श्री केसरीचन्दजी कोठारी (चूरू) तथा कोषाध्यक्ष श्रीचंदजी गणेशदासजी गधैया नियुक्त हुए। पत्र–व्यव्हार का सारा कार्य मंत्री श्री कोठारी जी देखते थे। इसका प्रथम कार्यालय 148, काटन स्ट्रीट में खोला गया। अर्थ-व्यवस्था का दायित्व श्रीचंद गणेशदास (133, मनोहरदास कटरा) को सौंपा गया। पहली कार्यकारिणी में तीन पदाधिकारियों के अलावा दस व्यक्ति और थे – रावतमलजी सेठिया (सरदारशहर), फूसराजजी पटावरी (सरदारशहर) (ये बाद में मुनि बने), सौभाग्यमलजी बांठिया (जयपुर), गिरधारीलालजी बोथरा (लाडनूं), जैसराजजी कठोतिया (सुजानगढ़), जोरावरमलजी बैद (रतनगढ़), दूलिचंदजी सेठिया (लाडनूं), हजारीमलजी नाहटा, तिलोकचंदजी बुरड़ (लाडनूं), फूसराजजी दुगड़ (सरदारशहर)।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में तेरापंथी सभाओं की स्थापना के बाद यह आवश्यक समझा गया की कलकत्ता स्थित केंद्रीय कार्यालय का नाम बदलकर महासभा कर दिया जाये। परिणामस्वरूप 30 जनवरी, 1947 को चूरू में संपन्न 34वें वार्षिक अधिवेशन में सर्वसम्मति से सभा का नाम ‘जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा’ कर दिया गया।

तेरापंथी सभा की पहली मीटिंग

28 अक्टूबर, 1913 को तेरापंथी सभा की स्थापना के बाद 2 नवम्बर 1913 को कार्यकारिणी की पहली बैठक 15, नूरमल लोहिया लेन (उस समय इसे पांचा गली कहा जाता था), कोलकाता में थानसिंह कर्मचंद (बीदासर के दुगड़) के कमरे में हुई।

तेरापंथी सभा का निजी कार्यालय

तेरापंथी सभा का कार्यालय पहले 71, क्लाइव स्ट्रीट में किराए के मकान में खोला गया था। इसके बाद सभा का कार्यालय 30/2 क्लाइव स्ट्रीट, फिर 28 स्ट्रांड रोड, 156 सुतापट्टी, 156 हरीसन रोड, 201 हरीसन रोड होते हुए अंत में अपने निजी भवन 3, पोर्चुगीज चर्च स्ट्रीट, कोलकाता – 700001 में आ गया और तबसे यहाँ कार्यरत है।

ट्रस्ट बोर्ड का गठन

विधान में ट्रस्ट बोर्ड के गठन एवं ट्रस्टियों के चुनाव का प्रावधान था। उसके अनुसार 16 अगस्त 1914 को ट्रस्ट बोर्ड का गठन हुआ जिसके निम्नलिखित सदस्य थे –

  1. चैनरूप संपतरामजी दुगड़ (सरदारशहर)
  2. तेजपाल वृद्धिचंदजी सुराणा (चूरू)
  3. श्रीचंद गणेशदासजी गधैया (सरदारशहर)
  4. बींजराज हुकमचंदजी बैद (रतनगढ़)
  5. जेसराज जैचंदलालजी बैद (राजलदेसर)
  6. रतनचंद शोभाचंदजी
  7. हजारीमल मुल्तानमलजी

इसका कार्य संघीय प्रयोजन हेतु समाज से लिए जाने वाले चंदे के समुचित उपयोग व पारदर्शिता पर ध्यान रखना था।

पुस्तकालय का प्रारम्भ

30 अगस्त 1914 को सभा का ऑफिस 71, क्लाइव स्ट्रीट में आते ही विद्यालय व पुस्तकालय की योजना बनने लगी। 4 अक्टूबर 1914 की मीटिंग में पुस्तकालय प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। मीटिंग में पुस्तकालय का दायित्व रायचंदजी सुराणा (चूरू) को सौंपा गया।

पहला वार्षिक अधिवेशन

24 मई 1914 को कलकत्ता में तेरापंथी सभा का पहला वार्षिक अधिवेशन हुआ। चुनाव विधिवत तथा सर्वसम्मति से हुआ। सभा की कार्यकारिणी में अधिक से अधिक गाँवों के लोगों का प्रतिनिधित्व हो, ऐसा निर्णय लिया गया। सभा का व्यापक स्वरूप पहले वर्ष में ही बन गया था। कलकत्ता में उस समय जितने गावों के लोग रहते थे सभी गावों को प्रतिनिधित्व दिया गया। उसमें निम्नलिखित पदाधिकारियों का चयन किया गया:-

अध्यक्ष – रिद्धकरण सुराणा,
उपाध्यक्ष – अमोलकचंदजी बेंगानी,
मंत्री – केशरीचंदजी कोठारी,
उपमंत्री – छोगमलजी चौपड़ा,
कोषाध्यक्ष - श्रीचंदजी गणेशदासजी गधैया,
हिसाब परीक्षक – गुलाबचंदजी भैरुदान।

पदाधिकारियों के अतिरिक्त कार्यकारिणी के 77 सदस्य चुने गए।
तीस क्षेत्रों के 77 सदस्यों का कार्यकारिणी में लेना इस बात का साक्षी है कि सभा को व्यापक आधार प्रदान करने का कार्यकर्ताओं के मन में सार्थक चिंतन रहा होगा।

विवरणों की अनुपलब्धता

21 जनवरी 1917 से लेकर 21 अप्रैल 1938 तक की अवधि में महासभा द्वारा किये गए क्रियाकलापों का विवरण उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस बीच जो बैठकें हुईं उनके कार्यवृत उपलब्ध नहीं हैं। इसकी वजह यह थी की द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कलकत्ता से महासभा की मिनट बुक, गजट, पत्राचार आदि सामग्री गंगाशहर-बीकानेर भेज दी गयी। विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद सारी सामग्री जब कलकत्ता भेजी गयी तो वे कहीं गुम हो गईं। अतः लिखित सामग्री के आभाव में उस अवधि का इतिहास नहीं लिखा जा सका। उसके बाद 21 अप्रैल 1938 से मिनट बुक के आधार पर इतिहास का लेखन प्रारंभ हुआ।


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