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जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा का स्वरूप मूलतः संगठनात्मक है। तेरापंथी समाज का संगठन कैसे सुदृढ़ बने, धर्मसंघ पर किसी प्रकार का आतंरिक या बाह्म आघात न हो, स्थानीय सभाएं अपने उदेश्यों की पूर्ति हेतु सक्रीय रहें, इस ओर सतत जागरूक रहना महासभा का प्रमुख दायित्व है। अतः सन् 1987 के महासभा के नये संशोधित विधान में तेरापंथ समाज की सभी स्थानीय तेरापंथी सभाओं को सहयोगी सदस्य (एफिलिएटेड मेम्बर) बनाने का प्रावधान रखा गया।

कोई संस्था, जिसके सदस्य केवल श्रावक/श्राविका हों और जिसके उद्देश्य महासभा के अनुकूल, वह महासभा द्वारा निर्धारित प्रपत्र में आवेदन पत्र प्रस्तुत कर और निर्धारित शुल्क जमा करा कर महासभा का संबद्ध सदस्य बन सकती है। एफिलिएटेड सभाओं को वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो महासभा के अन्य सदस्यों को प्राप्त हैं। महासभा की कार्यकारिणी के 100 सदस्य होते हैं। तेरापंथ विकास परिषद एवं तेरापंथ अमृत संसद के पारित प्रस्ताव (14, 15/10/2000) के अनुसार सभी तेरापंथी सभाओं का महासभा के साथ एफिलिएशन अनिवार्य है। असंबद्ध सभाओं को संघीय संस्था के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी। महासभा द्वारा केंद्रीय दिशानिर्देशों एवं कार्यक्रमों की अवगति सम्पूर्ण श्रावक समाज तक एफिलिएटेड सभाओं के माध्यम से प्रदान की जाती है।


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